- मरीजों को ले जाती एंबुलेंसी को नहीं मिलता रास्ता
- व्यवस्था नहीं बदलती और जनता यूं ही पिस रही
- देहरादून की यातायात व्यवस्था पर उठे कई सवाल
- जाम में फंसता आम आदमी तो जवाबदेही किसकी
देहरादून। दून की सड़कों पर आम आदमी का चलना मुश्किल है। कहीं वीआईपी वाहनों का सड़क के बीचोंबीच जमावड़ा है, तो कहीं फुटपाथ पर दुकानदारों का कब्जा। नतीजा यह कि पैदल चलने वालों को सड़क पर उतरना पड़ता है और वाहन चालकों को कदम-कदम पर जाम से जूझना पड़ता है। शहर की सड़कों पर अतिक्रमण और बेतरतीब पार्किंग ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जिसमें परेशानी आमजन की है, लेकिन व्यवस्था की जवाबदेही तय होती नजर नहीं आती।
देहरादून की पहचान कभी अपेक्षाकृत शांत और व्यवस्थित शहर के रूप में होती थी। आज शहर की व्यस्त सड़कों पर निकलना किसी चुनौती से कम नहीं। बाजारों में खरीदारी के लिए निकले लोग हों, दफ्तर पहुंचने की जल्दबाजी में कर्मचारी या स्कूल-कालेज जाने वाले विद्यार्थी हर किसी को जाम के झाम से गुजरना पड़ता है। कई जगह सड़क के किनारे खड़े वाहन और फुटपाथ पर फैली दुकानें पहले से सीमित रास्ते को और संकरा कर देती हैं।
शहर में यातायात की समस्या का एक बड़ा पहलू बेतरतीब पार्किंग है। वीआईपी और अन्य वाहनों के सड़क किनारे या सड़क के बीचोंबीच खड़े होने से यातायात की रफ्तार प्रभावित होती है। जहां वाहन खड़े करने के लिए निर्धारित स्थान उपलब्ध नहीं हैं या उनका उपयोग नहीं किया जा रहा, वहां सड़क ही पार्किंग स्थल बन जाती है। सवाल यह है कि सार्वजनिक सड़क पर इस तरह वाहन खड़े करने की छूट आखिर किस आधार पर मिलती है? नियम यदि आम नागरिक के लिए हैं, तो उनका पालन रसूखदारों से भी क्यों नहीं कराया जाता? दूसरी ओर, फुटपाथ पर दुकानों और अस्थायी कारोबार का फैलाव पैदल चलने वालों के अधिकार को सीमित कर रहा है। फुटपाथ का उद्देश्य लोगों को सुरक्षित रास्ता देना है, न कि उसे व्यापारिक गतिविधियों के लिए खुला छोड़ देना। जब फुटपाथ पर चलने की जगह नहीं बचती, तो पैदल यात्रियों को मजबूरन सड़क पर उतरना पड़ता है। इससे यातायात बाधित होने के साथ दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ता है।
जाम का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ता है, जिनके पास समय और संसाधनों की सीमित गुंजाइश होती है। दफ्तर जाने वाले कर्मचारी देर से पहुंचते हैं, विद्यार्थियों की दिनचर्या प्रभावित होती है और मरीजों को अस्पताल पहुंचने में परेशानी हो सकती है। ईंधन की बर्बादी और वाहनों से निकलने वाला धुआं अलग समस्या है। यानी अतिक्रमण और अव्यवस्थित पार्किंग का नुकसान केवल कुछ मिनट की देरी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शहर की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और नागरिकों की दिनचर्या पर भी पड़ता है।
सबसे बड़ा सवाल नगर निगम, यातायात पुलिस और संबंधित विभागों की भूमिका को लेकर है। यदि फुटपाथ पर अतिक्रमण है, तो उसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है? यदि सड़क पर वाहन बेतरतीब खड़े हैं, तो चालान और कार्रवाई क्यों प्रभावी नहीं दिखती? और यदि किसी खास व्यक्ति या वाहन को नियमों से छूट मिल रही है, तो उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा? शहर की यातायात व्यवस्था केवल त्योहारों, विशेष आयोजनों या वीआईपी आवागमन के दौरान सक्रिय रहने से नहीं सुधर सकती। इसके लिए रोजाना निगरानी और नियमों का समान रूप से पालन जरूरी है।
देहरादून में यातायात का दबाव बढ़ने के साथ पार्किंग स्थलों की उपलब्धता, फुटपाथों की सुरक्षा और बाजारों में अतिक्रमण का समाधान प्राथमिकता बनना चाहिए। अवैध पार्किंग पर नियमित कार्रवाई, पैदल यात्रियों के लिए फुटपाथ खाली रखने, दुकानदारों के लिए निर्धारित स्थानों की व्यवस्था और व्यस्त बाजारों में यातायात प्रबंधन जैसे कदम जरूरी हैं। केवल अभियान चलाकर कुछ दिन रास्ते खाली करा देना स्थायी समाधान नहीं है। कार्रवाई निरंतर होनी चाहिए और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ बिना भेदभाव के लागू होनी चाहिए।
राजधानी होने का अर्थ केवल सरकारी कार्यालयों और वीआईपी आवाजाही का केंद्र होना नहीं है। राजधानी की असली पहचान इस बात से बनती है कि वहां आम नागरिक कितनी आसानी से, सुरक्षित ढंग से और सम्मान के साथ आवागमन कर सकता है। सड़कें किसी रसूखदार की निजी पार्किंग नहीं और फुटपाथ किसी दुकानदार की निजी संपत्ति नहीं हैं। दोनों पर पहला अधिकार सार्वजनिक उपयोग का है। देहरादून की सड़कों पर आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शहर की सड़कें और फुटपाथ आम जनता के लिए हैं, या उनका इस्तेमाल वही करेगा जिसके पास रसूख है या जो नियमों को ताक पर रख सकता है? जब तक इस सवाल का जवाब कार्रवाई के रूप में नहीं मिलता, तब तक आम आदमी जाम में फंसता रहेगा और राजधानी की यातायात व्यवस्था बदहाली की कीमत उससे वसूलती रहेगी।


